इस्लाम के तत्व के लिए जरुर पढ़ें – ⁠’शांति का धर्म इस्लाम’

0
105

इस्लाम शांति का धर्म है। कुर’आन स्पष्ट निर्देश (5:32) देता है कि एक भी निर्दोष की हत्या महानरसंहार के समतुल्य है। पैगम्बर मुहम्मद ने हमेशा सुलह की कोशिश की थी, सुलह नामुमकिन होने पर ही उन्होंने युद्ध का समर्थन किया था। यहां तक कि एक मौके पर नुकसान सह कर भी, अन्याय सह कर भी उन्होने सुलह का रास्ता अपनाया था। फिर भी उनके पहले अरब अनुयायियों ने उन्हें शांति और सुलह के प्रवर्तक के रूप में नहीं देखा, यहाँ तक कि उनके जीवन चरित ‘मगहज़-इ-रसूल्लुलाह’ कहलाए, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘पैगम्बर के युद्ध व्रितांत। यह और भी आश्चर्यजनक लगता है क्योंकि पैगम्बर ने अपने जीवन में बस एक या दो बार तलवार उठाई थी, चौवन की उम्र में और बस अपने को बचाने के लिए।

आज मुसलमानों को कई धार्मिक विचारक जिहाद पर जाने के आदेश दे रहे हैं, और जिहाद इस्लाम में विश्वास नहीं करने वालों के विरुद्ध युद्ध का पर्याय बन गया है । यह विचारणीय है कि शांति और सुलह के प्रतीक पैगम्बर ने जो संदेश दिया वह क्यों और कैसे युद्ध के संदेश में बदल गया और कैसे बग़दादी जैसा उन्मादी ही नहीं अल अज़हर की विदूषी भी कह सकती है कि युद्ध में बंदी बनी स्त्रियोँ के साथ बलात्कार को इस्लाम जायज़ बताता है

काफिरों के देश को छोड़ इस्लाम की ज़मीं (दारुल इस्लाम) पर जाना मुसलमानों का एक धार्मिक कर्तव्य माना गया है। कोई सौ साल पहले हजारो भारतीय मुसलमान औटोमन खलीफा का साथ देने तुर्की गए थे। कुछ ने अपनी जान गँवा दी, अधिकतर बरबाद हो कर लौट आए। जब बग़दादी खिलाफ़त का ऐलान हुआ था तो पूरे विश्व से कुछ मुसलमानों ने इसका स्वागत किया। हिंदुस्तान के भी कई मुस्लिमअखबारों ने इस नए खिलाफ़त के उदय पर खुशी जताई थी। एक धर्मविद ने तो, कहा जाता है, बग़दादी को ‘अमीरुल मोमिनीम’ यानी सभी मुसलमानों का अमीर घोषित कर दिया था। मुस्लिम विश्वास है कि संसार के अंतकाल में जो खलीफा आएगा वह पूरे विश्व से मूर्ती पूजा दूर कर हर जगह इस्लाम का ईमान स्थापित कर देगा।

बग़दादी में बहुतों को वही खलीफा दिखा था। (ध्यातव्य है कि कोई डेढ़ सौ साल पहले सूडान में भी एक ऐसा नेता, महादी, पैदा हुआ था।) जब बग़दादी ने बंदी स्त्रियोँ के बलात्कार को जायज़ बताया और ‘सही ढंग से’ उनका बलात्कार करने के लिए मैन्युएल जारी किए तब जाकर कहीं हमारे अखबारों के जोश ठंढे पड़े। किंतु धार्मिक विद्वानों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखा।

इसका कारण है कि एक प्रबल मुस्लिम बौद्धिक परंपरा इसे सही बताती आई है। जो विद्वान ईमानदारी से इस परंपरा का अध्ययन करेंगे उनके विचार ज़ाकिर नाइक के निष्कर्ष से भिन्न नहीं हो सकते।

मुस्लिम उग्रवादी (और मुसलमानों के अंध विरोधी भी) कुर’आन शरीफ के 8:12 और 3:15 के हवाले देते नहीं थकते। बहुत मुस्लिम उन्हे उनके संदर्भ देखते हुए पढ़ते हैं। ये पद पैगम्बर को ऐसे युद्ध के समय मिले थे जब मुसलमानों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। विचारवान कभी उसमें शाश्वत आदेश नहीं देख सकते। किंतु कोई धार्मिक विद्वान, वे उदारवादी भी जो मुस्लिम उग्रवाद की भर्त्सना करते हैं, यह नहीं मानते कि ये संदेश पैगम्बर को अस्तित्व बचाने के लिए मिले थे। स्थिति यह है कि मुस्लिम विद्वान उग्रवाद का तो विरोध करते हैं पर उस उग्रवाद के आधारभूत बौद्धिक, धार्मिक सिद्धांत का विरोध नहीं करते।

लेखक – सच्चिदानंद जी महराज

Comments

comments

Related posts:

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here