बहिष्कार, पर जोश नहीं होश में

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आज सभी राष्ट्रवादी मित्र जोश में कह रहे हैं ….चाइना के सामानों का पूर्ण बहिष्कार | जब इस जोश के साथ थोडा होश मिलाते हैं तो पता चलता है कि बाजार तो चाइना के सामानों से ही भरा पड़ा है ..यदि इनका प्रयोग नहीं करेंगे तो जीवन की गाडी कैसे चलेगी | प्लास्टिक से निर्मित अधिकांश सामान , सजावट के सामान , क्रोकरी , मोमबत्ती , खिलौने , दीवाली के पटाखे , होली का गुलाल , सिंथेटिक कपड़ों से लेकर इलेक्ट्रानिक्स के सामान ..सब के सब तो चाइना निर्मित हैं |
मोटे तौर पर इस सामानों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है ..पहले में वो जिनका विकल्प उपलब्ध नहीं है ; दूसरे में वो जिनका बिकल्प तो उपलव्ध है पर वितरण गठजोड़ की वजह से विकल्प बाजार तक पहुँचते नहीं और तीसरे में वो सामान जिन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ चाइना में निर्मित करवाती हैं |

आइए पहले बात करते हैं उन सामानों की जो विकल्प ना होने की वजह से या कम होने की वजह से भारत में बिकते हैं | यहाँ पर हमारी “Make In India” पालिसी फेल होती दिख रही है ….दीवाली का दीपक तो सदा से गाँव का कुम्हार बनाता रहा है ..आखिर हम उसे क्यों नहीं आधुनिक कर पाए ? इस कुटीर उद्धोग पर क्यों सरकारों का ध्यान नहीं जाता ? प्लास्टिक से बने सामानों का भारत चाहे तो बहुत बड़ा निर्यातक बन सकता है | लोग दलील देते हैं कि चीन में मजदूरी सस्ती है और कोई गुणवत्ता का मानक नहीं है इसलिए चीन का सामान सस्ता होता है | क्या भारत के हर हाँथ के पास काम है ? यदि “हाँ” तो मनरेगा जैसी आत्मघाती योजनाएं क्यों चलायी जा रही हैं…उत्तर स्पष्ट है “नहीं” | तो फिर उन हांथो को काम दीजिये ..प्लास्टिक के सामान आप छोटी जगहों पर बनाइए ..सब कुछ मुम्बई , दिल्ली , चेन्नई और बैंगलोर में ही बनेगा तो महंगा होगा ही | कुछ मोतिहारी और दरभंगा में भी बनना चाहिए ….|

तो राष्ट्रवादिओं , इन उद्धोगों में हाँथ आजमाइए …राष्ट्र निर्माण वहीँ से होगा | सरकार को भी गुणवत्ता के पैमाने मजबूत करने होंगे …यदि दोनों काम एक साथ हो जाय तो इस श्रेणी में हम बिना चीन के सामानों के आसानी से जी सकते हैं | यह सब छोटी पूंजी से हो सकता है किसी बड़ी पूंजी की आश्यकता नहीं है ..गुणवत्ता का लाभ जो मिलेगा सो अलग ….अन्यथा चीन तो सस्ते अंडे भी प्लास्टिक से बनाता है ..वहां की गरीब जनता मज़बूरी में खाती है …कल को सस्ते के चक्कर में भारत वाले भी खा रहे होंगे …

बात करते हैं दूसरी श्रेणी की …करीबन दो वर्ष पुरानी बात होगी जब हमने घूम – घूम कर बैंगलोर के एक इलाके में टाफी ( कैंडी) खोजी थी और कमसे कम पचासों दुकानें छानने के बाद भी मै अपनी बिटिया को भारत में निर्मित कैंडी नहीं दिलवा पाया था | भारत सरकार का नियम है कि सभी शाकाहारी खाद्य पदार्थों पर हरा और मांसाहारी पर लाल निसान होना चाहिए | …कई बार दुकान से कुछ सामान लीजिये तो छुट्टे के तौर पर दूकानदार टाफी ( कैंडी) पकड़ा देता है…कभी ध्यान से देखिएगा महानगरों में जो कैंडी वो देते हैं उसपर कोई निसान नहीं होता है …चाइना या अरब की बनी होती हैं ..यह मेरा बैंगलोर का अनुभव है ; दूसरे महानगरों में स्थिति कुछ और हो सकती है | यह हाल उस सामान का है जिसके तमाम भारतीय बिकल्प उपलव्ध हैं | स्पष्ट है …भारतीय बाजारों में चाइना के सामानों के भरे होने के पीछे उनके सस्ते होने के साथ – साथ पीछे के वितरण तंत्र का भी बहुत बड़ा हाँथ है | यहाँ हमारा असली जोश काम आएगा …आगे से किसी भी दुकान पर जाएं तो भारतीय बिकल्प मांगे …भारतीय बिकल्प ना होने की स्थिति में चार बात सुना के आएं ….यह सब महीना भर भी चल गया तो दुकानदार सुधर जाएंगे …

तीसरी श्रेणी के सामानों के वहिष्कार के लिए छुट्टी के दिन शोरुम में जाएं …खरीदने नहीं बस मजे के लिए …भाव – ताव करके सामान ( महंगा टीबी , फ्रिज …) पसंद करें फिर एक बार टैग चक कीजिये …”Made In China “ दिखाकर घर वापस आ जाइए …लेना किसे था !! महीने भर यह हो जाय …बस आप देखना भारत को दोहरा फायदा होगा …चीन टूटेगा एक तरफ दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपना प्लांट भारत में लगाने पर तेजी दिखाएंगी …बुजुर्गों ने कहावत “ आम के आम गुठलिओं के दाम” इसी दिन के लिए गढ़ी थी …

याद रखिये आप के द्वारा खर्च किए हुए प्रत्येक रुपये के कुछ पैसे बारूद बनकर कश्मीर तक आते हैं , जो हमारे सैनिकों के सीने को प्रतिदिन छलनी करते हैं …इसपर लगाम लगाना हर राष्ट्रवादी का कर्तव्य है |

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