भारत के खिलाफ 1962 में लड़ा था युद्ध, अब पीएम मोदी से गुहार- मैं वापस चीन जाना चाहता हूं

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भारत में रह रहे 77 साल के एक चीनी युद्धबंदी को उम्मीद है कि उन्हें अपने वतन जा कर परिजनों से मिलने की इजाजत मिलेगी. भारत-चीन युद्ध के दौरान पकड़े गए इस युद्धबंदी का बालाघाट जिले में पुनर्वास किया गया था.

वांग ची नाम का यह युद्धबंदी 1969 से मध्य प्रदेश के बालाघाट के तिरोड़ी गांव में रह रहा है. 1960 में चीनी सेना को ज्वाइन करने वाले वांग ची को अब अपने इलाके में राज बहादुर नाम मिला हुआ है.

वांग ची को भारत-चीन युद्ध के दौरान जनवरी 1963 में भारतीय रेड क्रॉस ने पकड़कर असम में भारतीय सेना के हवाले कर दिया था.

वांग ची को अगले छह साल उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान की अलग-अलग जेलों में रखा गया. 1969 में जेल से रिहा करने के बाद वांग ची का मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के तिरोड़ी गांव में पुनर्वास कर दिया गया. वांग ची करीब पांच दशक से यहां ही रह रहे हैं.

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दोनों देशों की सरकारों ने नहीं लिया कोई एक्शन
वांग ची ने बताया कि वह 2014 से भारत और चीन सरकार से अपने देश वापस जाकर भाई-बहनों से मिलने की अनुमति मांग रहे हैं, लेकिन अब तक दोनों देशों की सरकारों ने उसकी मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई है. वांग ची के तीन भाई और दो बहनें हैं, जो चीन में ही रहते हैं.
पीएम नरेंद्र मोदी से बड़ी उम्मीदें
परिवार और अपने वतन की बात करते हुए वांग ची कई बार भावुक हो जाते हैं. उन्हें अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से उम्मीदें हैं. वह कहते हैं, मैनें दोनों के बारे में बहुत सुना है और मैं उनसे अनुरोध करता हूं कि मुझे अपने भाई-बहनों से मिलने की अनुमति दें.’
काफी प्रयासों के बाद जारी हुआ पासपोर्ट
काफी प्रयासों के बाद वर्ष 2013 में वांग ची को चीनी पासपोर्ट (नंबर G54188589) जारी हुआ. इसी आधार पर इस युद्धबंदी ने वापस अपनी भारतीय पत्नी और बच्चों के पास लौटने की शर्त पर अपने वतन जाने की अनुमति मांगी थी. करीब दो साल गुजरने के बावजूद दोनों सरकारों ने अब तक इस पर कोई फैसला नहीं लिया है.
मैं अपनी मां का ‘लाडला बेटा’
वांग ची अपनी जवानी के दिनों को याद करते हुए कहते हैं, मैं अपनी मां का सबसे लाडला बेटा था. 2006 में मां का निधन हो गया था. तीन साल बाद में दुभाषिए की मदद से अपने भतीजे वांग यिन चुन से नई दिल्ली में मिला था. इस मुलाकात के बाद मेरी चीन जाकर परिजनों से मिलने की उम्मीदें जगी थीं. लेकिन अब यह सपना ही लगता है.



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