लाखो की चपत लगा रहे हैं अख़बार। जानिये कैसे

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​अख़बार बंट नहीं रहा तो, विज्ञापन का भुगतान भी नहीं होना चाहिए
लखनऊ में एक सितंबर से हॉकरों की हड़ताल के चलते अखबारों को वितरण ठप है। पुलिस की पहरेदारी में सौ—पचास पेपर बिक रहे हों, तो वो अलग बात है। देश का अग्रणी, नम्बर वन का ढिंढोरा पीटने वाले मीडिया संस्थानों का सरकारी कागजों में प्रसारण भले ही लाखों में हो, लेकिन हड़ताल ने तथाकथित बड़े संस्थानों को जमीन पर ला दिया है। हॉकरों की हड़ताल के पहले दिन यानी 1 सिंतबर को रोजमर्रा की तरह अखबार की प्रतियों का प्रकाशन हुआ। हड़ताल ​खिंचने के साथ—साथ अखबारों का प्रकाशन लाखों से चंद हजार या सैंकड़ों में पहुंच चुका है। 
मीडिया संस्थान अखबार रद्दी होने के डर से वास्तविक प्रसार संख्या के हिसाब से अखबार की प्रतियां प्रकाशित नहीं कर रहे हैं। हड़ताल की अवधि में उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग व भारत सरकार के डीएवीपी (डिपार्टमेंट आॅफ आडियो—वीडियो प पब्लिसिटी- DAVP) ने अखबारों को लाखों—करोड़ों का विज्ञापन जारी किया। अखबारों ने विज्ञापन छापा भी। जब अखबार वास्तविक संख्या से कम छप रहे हों और उनका प्रसारण चंद सौ—दो सौ लोगों तक हो रहा हो तो इसका सीधा अर्थ है कि मीडिया संस्थान सरकारी खजाने में करोड़ों की चपत लगा रहे हैं। और लाखों—करोड़ों के खर्च के बाद भी सरकार की बात जनता तक नहीं पहुंच रही है।  
आज 9 सिंतबर को डीएवीपी (DAVP भारत सरकार) द्वारा “सॉवरेन गोल्ड बॉण्ड स्कीम” का विज्ञापन लगभग हर बड़े अखबार में छपा है। इसके अलावा भी कई दूसरे सरकारी विज्ञापन राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाले ज्यादातर बड़े अखबारों में छपे हैं। जब अखबार रद्दी होने के डर से पूरी संख्या में अखबार छप नहीं रहे; अखबार जनता तक पहुंच नहीं रहे; तो सरकार का विज्ञापन पर किया गया खर्च बेकार ही तो गया।  
भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार को हड़ताल की अवधि (फिलहाल हड़ताल जारी है) में जारी किये गये विज्ञापनों का भुगतान मीडिया संस्थानों को नहीं करना चाहिए। अगर पेमेंट करना नियमों के मुताबिक जरूरी हो तो हड़ताल की अवधि में प्रसार के वास्तविक आंकड़ों के अनुपात में विज्ञापनों का भुगतान करना चाहिए।
सरकार अपनी योजनाओं व कार्यों के प्रचार—प्रसार के लिये करोड़ों रूपये का जो विज्ञापन जारी करती है, वो पैसा देश का आम आदमी टैक्स के रूप में भरता है। ऐसे में हड़ताल की अवधि में छपे विज्ञापन ​सरकार के प्रचार—प्रसार के उद्देश्यों को पूरा नहीं कर रहे हैं।  भारत सरकार और प्रदेश सरकार को इस मुद्दे पर उचित कार्यवाही करते हुये हड़ताल की अवधि में जारी किये ​विज्ञापनों का भुगतान सोच—समझकर करना चाहिए। क्योंकि विज्ञापनों में खर्च पैसा देश की जनता का है। और सरकारी पैसे की बर्बादी अपराध के सिवाय कुछ और नहीं है। 
आशा है उत्तर प्रदेश सूचना विभाग व डीएवीपी के अधिकारी इस मुद्दे पर गौर फरमांएगे और उचित एवं न्यायसंगत निर्णय लेंगे।

  • डॉ आशीष वशिष्ठ

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