​पुनर्जन्म और मोक्ष : एक चर्चा- पी के सिद्धार्थ

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मैंने कुछ दिन पूर्व मोक्ष पर एक चर्चा की थी। कई प्रकार के मोक्ष की। कई प्रकार की मुक्ति की। अस्तित्व-विलोपक मुक्ति और अस्तित्व-संधारक मुक्ति की। इन सभी के पीछे, चाहे वे हंदू धर्मपंथ की मुक्त अवस्थाएं हो या बौद्ध धर्मपंथ की मुक्ति, जिसे निर्वाण या निब्बान कहते है, पुनर्जन्म की अवधारणा  पर आधार रूप में स्थित हैं। दूसरी और कई धर्मपंथ तो मानते ही नहीं कि पुनर्जन्म होता है। अब कहीं यह सत्य हुआ तो फिर तो मोक्ष की सारी अवधारणा ही निरस्त हो  जायेगी! यह तो बहुत बड़ा खतरा है!
(ध्यान रहे कि पुनर्जन्म का निषेध ईसा ने नहीं किया, बल्कि ईसाई धर्मगुरुओं ने बहुत समय पूर्व एक बड़ी मीटिंग कर किया था। ईसा ने तो कहा कि जॉन द बैप्टिस्ट का पुनर्जन्म हुआ। पुनर्जन्म किसी एक व्यक्ति का हो और अन्य का नहीं हो, यह बात कुछ समझ में नहीं आती।)

यह भी ध्यान रहे कि स्वर्ग, नर्क फिज़िकल स्पेस में हैं ऐसा नहीं। वहां जीवों के ‘शरीर’ को जो सुख या यातनाएं मिलती हैं वे भी ‘फिजिकल’ ता भौतिक शरिर को मिलती हैं, ऐसा नहीं लगता। ये चीज़ें एक अलग प्रकार के स्पेस डाइमेंशन में अवस्थित हैं ऐसा लगता है। साकेत धाम, बैकुंठ आदि में जिस शरीर के साथ जीव चिरंतन काल तक रहता है, वह अनश्वर शरीर पंचतात्त्विक नहीं दिव्य होता है। ये मुक्त दिव्य धाम और दिव्य शरीर भौतिक स्पेस से इंटरसेक्ट नहीं करते। इस स्पेस को कुछ आध्यात्मिक द्रष्टा ‘चिदाकाश’ भी कहते हैं। यह चिदाकाश, स्वर्ग नर्क, बैकुंठ आदि ‘इम्पीरिकलि वेरिफाइएबल’ या इंद्रियगम्य प्रमाण से युक्त नहीं हैं। फिर सामान्य साधक, जो ‘दिव्य दृष्टि’ से संपन्न नहीं हैं, क्या करें? आस्था पर ही सब कुछ आधृत करें?

साधना से दिव्य दृष्टि, जो अर्जुन को श्री कृष्ण ने प्रदान की, प्राप्त करने के पूर्व, ट्रांसेंडेंटल वर्ल्ड या इंद्रियगमएतर जगत के आशरभूत कांसेप्ट पुनर्जन्म को कैसे वेरिफाई करें?
पुनर्जन्म होता है या नहीं, यह कैसे प्रमाणित करें?

सौभाग्य से पुनर्जन्म तो इम्पीरिकालि वेरिफाइएबल वर्ल्ड या इन्द्रिय-अनुभवगम्य जगत में होता है। इसलिए, इसकी व्यसपक जांच वर्जीनिया विश्व विद्यालय पैरा साइकोलॉजी विभाग ने की। उसने पूर्व जन्म की स्मृति वाले हज़ारों मामले डोक्युमेंट किये। इनमे बड़ी संख्या में बच्चे थे। उन्हें दशकों लंबे शोध जे दौरान उन स्थानों पर ले जाया गया जो कथित रूप से उनके पिछले जन्म का स्थान था। उनकी स्मृति से मिला कर सम्बन्धियों और घटनाओं की जाँच की गयी। लगभग 3000 मामले सही पाये गए। आप नेट पर जा कर स्वयं देख लें।

इसीलिए कहते हैं कि भारतीय ऋषियों ने ट्रान्सेंडैंटल वर्ल्ड में उतना ही वैज्ञानिक शोध किया जितना पश्चिमी जगत ने इम्पीरिकल वर्ल्ड में किया। अध्यात्म भी एक विज्ञानं है। मगर इन्हीं द्रष्टा दिव्यदृष्टि संपन्न ऋषियों के बीच ऐसे लोग भी हुए जो इम्पोस्टर या नकली ऋषि थे, जिन्होंने झूठे सिद्धांत भी गढ़े।


लेखक- पी के सिद्धार्थ। (अध्यक्ष भारतीय सुराज दल)

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