जानिए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बारे में

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आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) एक NGO है जो श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में सन 1973 में अस्तित्व में आया था… AIMPLB एक निजी संस्था है जिसकी वर्किंग कमेटी में 41 उलेमा होते हैं तथा इसकी जनरल बॉडी में 201 उलेमा शामिल हैं… हालाँकि आरिफ़ मोहम्मद ख़ान, ताहिर मोहम्मद जैसे मुस्लिम विद्वानों ने और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने इसे समाप्त करने के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं… ख़ास बात यह है कि मुल्क़ की शिया और अहमदिया आबादी इसके निर्णयों में भागीदार नहीं होती… अहमदिया/क़ादियानी मुस्लिमों को तो इसकी सभाओं में शरीक होने की भी इज़ाजत नहीं है… हालाँकि आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) के अलावा भी शिया मुस्लिमों का ‘आल इण्डिया शिया पर्सनल बोर्ड” और मुस्लिम महिलाओं का “आल इण्डिया मुस्लिम विमेंस पर्सनल ला बोर्ड” अलग से बने हैं…

दरअसल 1971 के बाद से ही इंदिरा जी के लिए जहां एक तरफ़ जयप्रकाश जी के नेतृत्व में समाजवादियों की राजनीतिक चुनौती थी, वहीं वो कांग्रेस पार्टी के आतंरिक संकटों से भी जूझ रही थीं… इस दौरान न्यायपालिका से भी इंदिराजी के सम्बन्ध काफी तल्ख़ हो चुके थे… सन 1971 के चुनाव में रायबरेली से हार जाने के बाद समाजवादी नेता राजनारायन ने इंदिराजी के ख़िलाफ़ मुकदमा ठोंक दिया था, जिसे वो 1975 जीते भी थे और तभी इमरजेंसी भी लागू की गयी थी…

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इसी दौरान 1973 में इज़रायल-अरब झगड़े में इज़रायल को अमेरिकी मदद के खिलाफ़ सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल-निर्यातक देशों के संगठन ओपेक द्वारा तेल उत्पादन और निर्यात पर कड़े नियंत्रण लगाने से भीषण तेल-संकट पैदा हो गया था… तेल के दामों में तीन डॉलर प्रति बैरल से 12 डॉलर प्रति बैरल तक की वृद्धि एकदम से हुई थी… दुनिया में तेल का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी अमेरिकी ख़ेमे में थे और 1971 के पाकिस्तान युद्ध के दौरान से ही भारत के अमेरिका से रिश्ते अच्छे नहीं थे… इन हालातों में तेल के लिए पाकिस्तान-परस्त कट्टरवादी मुल्क सऊदी अरब और उसके गिरोह मुल्कों से किसी भी तरह तेल खरीदने की इंदिरा साकार मज़बूर थीं… इन सब कारणों से संकटग्रस्त इंदिरा सरकार आंतरिक अव्यवस्था और ख़राब अर्थव्यवस्था के कठिन दौर में थी… सन 1973 आते-आते भीषण मंहगाई से त्रस्त जनता द्वारा समूचे उत्तर भारत में व्यापक जनआंदोलन शुरू हो चुके थे… लिहाज़ा चौतरफ़ा संकटों से घिरी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा भारतीय मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथियों और उनके वैश्विक आका सऊदी अरब को प्रसन्न करने के लिए ही इस AIMPLB के NGO को सरकार की तरफ से इसके गठन और संरक्षण में पूरा योगदान किया गया था… इससे बहाने नज़दीक आ रहे अगले संसदीय चुनावों में समाजवादियों द्वारा खिसकाए जा रहे कांग्रेस के पुराने मुस्लिम वोट-बैंक के धर्मनेताओं को भी अपने पक्ष में साधना चाहती थी…

आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) ने मुस्लिम महिलाओं के लिए तलाक़ के शरिया नियमों में किसी बदलाव का सदैव ही विरोध किया… 1978 में शाहबानों प्रकरण में मुस्लिम महिलाओं को गुज़ारा-भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को शरिया-विरोधी बताकर AIMPLB ने मानने से इनकार कर दिया था… और बाद में 1984 में बहुमत पाकर राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार ने उलेमाओं और AIMPLB के दबाव में 1986 में संसद में कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को शरिया के अनुकूल पलट दिया था… आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सदैव से Right of Children for Free and Compulsory Education Act, 2009 का भी विरोधी रहा है… क्योंकि इसका मानना है कि मुस्लिम बच्चों को स्कूली शिक्षा अनिवार्य करने से उनकी मदरसा शिक्षा पर प्रभाव पड़ेगा… आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड बाल-विवाह का समर्थन करते हुए संविधान के बाल-विवाह निषेधक Child Marriage Restraint Act का भी कड़ा विरोध करता है…

कहने को तो आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड (AIMPLB) के गठन का उद्देश्य शरिया कानूनों को संरक्षित करना और उनके आड़े आ रही कानूनी बाधाओं को दूर करना ही था… लेकिन यह मुल्क के मुसलमानों के स्वैच्छिक धार्मिक-निर्देशक और नियंत्रक की तरह कार्य करता है… इसने बाबरी मस्ज़िद प्रकरण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का भी पुरज़ोर विरोध किया… इसने जयपुर साहित्य फ़ेस्टिवल में सलमान रश्दी की वीडियो कांफ्रेंसिंग तक का इस्लाम पर खतरा बताकर कड़ा विरोध किया था… यही नहीं योग, सूर्य-नमस्कार, और वैदिक साहित्य-संस्कृति का भी यह कहते हुए विरोध किया कि यह सब इस्लाम-विरोधी ब्राह्मण-धर्म लागू करने का षड्यंत्र है… अब एक बार फिर से आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट और सरकार के खिलाफ तलवारें निकाल रही है… और तर्कहीन होने के कारण तीन तलाक मामले को पेचीदा बनाने के लिए इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने की साजिश प्रचारित कर रही है।



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