सतीश मिश्र नहीं ये शख्स था ब्राम्हणों को बसपा में एक जुट करने के पीछे।

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राजनीती त्याग के साथ साथ समर्पण भी मांगती है। 2007 में जब बहुजन समाज पार्टी की सरकार पूर्ण बहुमत से आई थी तब इसमें ब्राम्हणो का बहुत बड़ा योगदान था। लखनऊ में उस वक्त ब्राम्हणो की सबसे बड़ी रैली हुई थी जिसमे माना जाता है कि सूबे से लगभग 2 लाख ब्राम्हण इस रैली में शामिल हुए थे। पर इस बात का सारा श्रेय मायावती के करीबी रहे सतीश मिश्रा जी को दिया गया। पर सत्य बिलकुल इससे उलट था। सतीश मिश्रा की जमीनी राजनीती उतनी अच्छी नहीं है जितनी की अन्य नेताओं की रही है। सतीश मिश्रा को लोगो ने अपने बीच कम अपितु अख़बार टीवी में ज्यादा ही देखा है। इसी कड़ी में इसके सिरमौर ब्राम्हण नेता ब्रजेश पाठक ने जमीनी स्तर से जुड़कर कार्य किया। उन्ही के कारण पूरे सूबे के ब्राम्हण एक जुट हुए और बसपा की सरकार बनाई। यह तो गौरतलब ही है कि बसपा में शीर्ष नेतृत्व हमेशा से अपने निचले तबको पर भरी रहा है। यहाँ स्वयं के विचारों,सम्प्रेषणो का कोई महत्त्व नहीं रह जाता। वही कहा और देखा जाता है जैसा सुप्रीमो चाहती हैं। इसीलिए इसका सारा श्रेय सतीश मिश्रा जी को दे दिया गया। पर ब्रजेश पाठक ने अपनी जमीनी राजनीती को नहीं त्यागा वरन वह उस दिशा में और कार्य करते गए। ब्रजेश पाठक बसपा में ब्राम्हण चेहरे के रूप पे ही नहीं अपितु सभी धर्म,जाती को आगे लेकर बढ़ते रहे। हालाँकि राजनीती से जुड़े लोग इस बात से भली भांति परिचित है। इसी लिए भाजपा ने ब्रजेश पाठक को अपने साथ जोड़ा जिससे ब्राम्हणो को एक जुट किया जा सके।

जिस प्रकार से मिश्रा जी को ब्राम्हण नेता होने का श्रेय दिया गया उससे सूबे के ब्राम्हण काफी आहात हुए और परिणाम स्वरुप बसपा से समर्थन उन्होंने वापस लिया।

भारतीय राजनीति में राजनीती का मुकुट पहनाया पहनाया जाता रहा है। इसी परिपेक्ष्य में राहुल गांधी को देखा जा सकता है। उसी प्रकार ब्राम्हण चेहरे का ताज मिश्रा जी को पहना दिया गया। हालाँकि जमीनी स्तर पर सतीश मिश्रा अभी ब्रजेश पाठक से कोसो दूर हैं।

यूपी का इस बार का चुनावी कार्ड ब्राम्हण आधारित हो गया है , इसी कारण सभी दल ब्राम्हणो को रिझाने में लगे हुए हैं। कांग्रेस शीला दीक्षित को ब्राम्हण नेता के रूप में पेश कर मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना रही है वहीँ बसपा में सतीश मिश्र ब्राम्हणो को लुभाने का ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

वहीँ भाजपा ब्रजेश पाठक को अपनी पार्टी में शामिल कर फूली नहीं समा रही है। अब देखना यह होगा की भाजपा इनसे कितना सहयोग ले पाती है।

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