लखनऊ लोहिया अस्पताल में बुखार से दो बच्चों की मौत, जांच के दिए आदेश

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लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी में सोमवार सुबह बुखार से ग्रसित दो बच्चों ने दम तोड़ दिया। परिवारों का आरोप है कि बच्चे बुखार से तप रहे थे, लेकिन कोई डॉक्टर देखने तक नहीं आया।
तीमारदारों ने डॉक्टरों पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए कहा डॉक्टर और स्टाफ से बच्चे की हालत गंभीर होने पर रेफर करने तक के लिए कहा, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।
वहीं अस्पताल प्रशासन ने मामले में जांच के आदेश दिए हैं। इंद्रानगर तकरोही के रहने वाले सैफुद्दीन की बेटी अलीशा (3) को तेज बुखार आ रहा था।
रविवार रात करीब पौने एक बजे तीमारदार बच्ची को लेकर लोहिया अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया। इमरजेंसी में डॉ. अरुण गुप्ता ने बच्ची को देखा था।
इमरजेंसी बेड नंबर पांच पर शिफ्ट कराया। डॉक्टर का कहना था कि बच्ची बेहोशी की हालत में आई थी, उसकी हालत काफी नाजुक थी। सोमवार सुबह करीब आठ बजे बच्ची की सांसें उखड़ने लगीं।
डॉक्टर बच्ची का इलाज शुरू करते तब तक उसकी मौत हो गई। बच्ची की मौत से गुस्साएं तीमारदारों ने डॉक्टर-स्टाफ पर लापरवाही का आरोप लगाकर हंगामा शुरू कर दिया।
पिता का आरोप है कि कोई भी डॉक्टर भर्ती के बाद बच्ची को देखने नहीं आया। स्टाफ नर्स बच्ची का इलाज करती रही। इससे उसकी हालत और भी बिगड़ गई। बच्ची को रेफर करने के लिए कई बार कहा, मगर सुनवाई नहीं हुई।
इमरजेंसी में सुबह हंगामा बढ़ता देख अफसर मौके पर पहुंच गए और कार्रवाई का आश्वासन देकर उन्हें शांत कराया। बच्ची के मामा अफरोज अंसारी ने इलाज में कोताही और रेफर न किए जाने का आरोप लगाते हुए लिखित शिकायत निदेशक से की है।
निदेशक ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। जांच कमेटी तीन दिन में रिपोर्ट सौंपेगी। इसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
दूसरी मौत..
चिनहट मल्हौर के रहने वाले संजय बेटे आनंद (5) को उल्टी-दस्त और बुखार होने पर रविवार रात लोहिया की इमरजेंसी लेकर लाए थे। डॉक्टरों ने बच्चे की हालत गंभीर देख उसे भर्ती कर लिया। कुछ ही देर बाद उसे इमरजेंसी वार्ड में बेड नंबर 2 में शिफ्ट कराया गया। पिता का आरोप है कि इलाज में कोताही बरती गई। भर्ती करने के बाद डॉक्टर उसे देखने तक नहीं आए। इससे बच्चे की हालत और बिगड़ती चली गई। सोमवार सुबह करीब साढे़ सात बजे आनंद की मौत हो गई। नाराज तीमारदार लापरवाही का आरोप लगाते हुए इमरजेंसी वार्ड में हंगामा करने लगे। पिता का कहना है कि अगर सही समय पर इलाज मिल जाता तो बच्चा जिंदा होता। वहीं गार्डों ने दूसरे मरीजों का इलाज प्रभावित होने की बात कहकर उन्हें बाहर किया। मौके पर पहुंचे अधिकारियों ने मरीज की केस हिस्ट्री मंगाकर देखा। पिता को मरीज की पूरी स्थिति बताया। इसके बाद तीमारदार शव लेकर वापस चले गए।
निदेशक बोले- डॉक्टरों ने दवा लिख दी थी, नर्स दे रही थीं
जब अस्पताल के निदेशक डॉ. डीएस नेगी से रात में डॉक्टरों के मरीज न देखने के आरोप की बात की गई तो उनका कहना था कि डॉक्टर बच्चों को देखकर दवा लिख गए थे। नर्स दवाएं दे रहीं थी। लेकिन सवाल यह है कि यह जानते हुए कि बच्चों की हालत गंभीर है, क्या दवा लिख देना ही डॉक्टरों की जिम्मेदारी है? दवा का असर क्या है? हालत क्यों नहीं सुधर रही है? इन सवालों का जवाब कौन देगा।

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